Monday, 10 August 2015

जानिए किस दिन क्या करें..

Prabhu Sharanam: जानिए किस दिन क्या करें..

रविवार- यह सूर्य देव का वार माना गया है। इस दिन नवीन गृह प्रवेश और सरकारी कार्य करना चाहिए। सोने के आभूषण और तांबे की वस्तुओं का क्रय विक्रय करना चाहिए या इन धातुओं के आभूषण पहनना चाहिए।

सोमवार- सरकारी नौकरी वालों के लिए पद ग्रहण करने के लिए यह दिन बहुत महत्वपूर्ण है। गृह
शुभारम्भ, कृषि, लेखन कार्य और दूध, घी व तरल पदार्थों का क्रय विक्रय करना इस दिन फायदेमंद हो सकता है।

मंगलवार- मंगल देव के इस दिन विवाद एवं मुकद्दमे से संबंधित
कार्य करने चाहिए। शस्त्र अभ्यास, शौर्य और पराक्रम के कार्य
इस दिन करने से उस कार्य में सफलता मिलती है। मेडिकल से संबंधित कार्य और अॅापरेशन इस दिन करने से सफलता
मिलती है। बिजली और अग्नि से संबधित कार्य इस दिन करें तो जरूर लाभ मिलेगा। सभी प्रकार
की धातुओं का क्रय विक्रय करना चाहिए।

बुधवार- इस दिन यात्रा करना, मध्यस्थता करना, दलाली,
योजना बनाना आदि काम करने चाहिए। लेखन, शेयर मार्केट का काम, व्यापारिक लेखा-जोखा आदि का कार्य करना चाहिए।

गुरुवार- बृहस्पति देव के इस दिन यात्रा, धार्मिक कार्य, विद्याध्ययन
और बैंक से संबंधित कार्र्य करना चाहिए। इस दिन वस्त्र आभूषण
खरीदना, धारण करना और प्रशासनिक कार्य करना शुभ
माना गया है।

शुक्रवार- शुक्रवार के दिन गृह प्रवेश, कलात्मक कार्य, कन्यादान, करने का महत्व है। शुक्र देव भौतिक सुखों के स्वामी है। इसलिए इस दिन सुख भोगने के साधनों का उपयोग करें। सौंदर्य प्रसाधन, सुगन्धित पदार्थ, वस्त्र, आभूषण, वाहन आदि खरीदना लाभ दायक होता है।

शनिवार- मकान बनाना, टेक्रीकल काम, गृह प्रवेश, ऑपरेशन आदि काम करने चाहिए। प्लास्टिक , लकड़ी , सीमेंट, तेल, पेट्रोल खरीदना और वाद-विवाद के लिए जाना इस दिन सफलता देने वाला होता है।

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03/08/2015, 11:10 - ‪+91 73095 32824‬

Sunday, 2 August 2015

शिव का स्वरूप

शिव का स्वरूप और उसका माहात्म्य: ज़रूर पढ़ें

शिव का रूप-स्वरूप जितना विचित्र है, उतना ही आकर्षक भी। शिव जो धारण करते हैं, उनके भी बड़े व्यापक अर्थ हैं
:जटाएं : शिव की जटाएं अंतरिक्ष का प्रतीक हैं।

चंद्र : चंद्रमा मन का प्रतीक है। शिव का मन चांद की तरह भोला, निर्मल, उज्ज्वल और जाग्रत है।

त्रिनेत्र : शिव की तीन आंखें हैं। इसीलिए इन्हें त्रिलोचन भी कहते हैं। शिव की ये आंखें सत्व, रज, तम (तीन गुणों), भूत, वर्तमान, भविष्य (तीन कालों), स्वर्ग, मृत्यु पाताल (तीनों लोकों) का प्रतीक हैं।

सर्पहार : सर्प जैसा हिंसक जीव शिव के अधीन है। सर्प तमोगुणी व संहारक जीव है, जिसे शिव ने अपने वश में कर रखा है।

त्रिशूल : शिव के हाथ में एक मारक शस्त्र है। त्रिशूल भौतिक, दैविक, आध्यात्मिक इन तीनों तापों को नष्ट करता है।

डमरू : शिव के एक हाथ में डमरू है, जिसे वह तांडव नृत्य करते समय बजाते हैं। डमरू का नाद ही ब्रह्मा रूप है।

मुंडमाला : शिव के गले में मुंडमाला है, जो इस बात का प्रतीक है कि शिव ने मृत्यु को वश में किया हुआ है।

छाल : शिव ने शरीर पर व्याघ्र चर्म यानी बाघ की खाल पहनी हुई है। व्याघ्र हिंसा और अहंकार का प्रतीक माना जाता है। इसका अर्थ है कि शिव ने हिंसा और अहंकार का दमन कर उसे अपने नीचे दबा लिया है।

भस्म : शिव के शरीर पर भस्म लगी होती है। शिवलिंग का अभिषेक भी भस्म से किया जाता है। भस्म का लेप बताता है कि यह संसार नश्वर है।

वृषभ : शिव का वाहन वृषभ यानी बैल है। वह हमेशा शिव के साथ रहता है। वृषभ धर्म का प्रतीक है। महादेव इस चार पैर वाले जानवर की सवारी करते हैं, जो बताता है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष उनकी कृपा से ही मिलते हैं।

इस तरह शिव-स्वरूप हमें बताता है कि उनका रूप विराट और अनंत है, महिमा अपरंपार है। उनमें ही सारी सृष्टि समाई हुई है।

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ईश्वर बड़ा दयालु है!!

🙏ईश्वर बड़ा दयालु है!!🙏

एक राजा का एक विशाल फलों का बगीचा था. उसमे तरह-तरह के फल होते थे और उस बगीचा की सारी देखरेख एक किसान अपने परिवार के साथ करता था. वह किसान ईश्वर को बहुत मानता था ! उसका विश्वास था कि ईश्वर जो कुछ करते हे वह प्राणियों की भलाई के लिये करते हे ! वह किसान हर दिन बागीचा मैं के ताज़े फल लेकर राजा के राजमहल में जाता था.🙏
एक दिन किसान बगीचे में से अमरुद एक टोकरी और मीठे बेर की एक टोकरी लेकर राजमहल में जा रहा था, अब रस्ते में सोचने लगा की राजा को आज कोन सी टोकरी दू ? आखिर उसने मीठे बेर की टोकरी राजा को देने की सोची, किसान जब राजमहल में पहुचा, राजा किसी दूसरे ख्याल में खोया हुआ था, किसान ने मीठे बेर की टोकरी राजा के सामने रख दी और थोड़े दूर बेठ गया, अब राजा उसी खयालो-खयालों में टोकरी में से बेर उठाता था और किसान के माथे पे निशाना साधकर फेक रहा था.🙏

राजा का बेर जब भी किसान के माथे पर लगता था किसान कहता था, ‘ईश्वर बड़ा दयालु है’ राजा फिर बेर फेकता था किसान फिर वही कहता था ‘ईश्वर बड़ा दयालु है’
अब राजा को आश्चर्य हुआ, उसने किसान से कहा, मै तुझे बार-बार बेर मार रहा हु, और बेर जोर से तुम्हारे सिर पर लग रहे हैं, फिर भी तुम यह बार-बार क्यों कह रहे हो की ‘ईश्वर बड़ा दयालु है’🙏
किसान ने नम्रता से बोला, महाराज, मैं तो आज आपको बड़े-बड़े अमरुद की टोकरी दे रहा था, लेकिन अचानक मेरा विचार बदल गया और आपके सामने मैं ने अमरूद के बजाय बेर की टोकरी रख दी, यदि बेर की जगह अमरुद रखे होते तो आज मेरा हाल क्या होता ? इसीलिए मैं कह रहा हू की ‘ईश्वर बड़ा दयालु है’!!🙏

हरे कृष्ण हरे कृष्ण , हरे राम हरे राम 🙏
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 बहुत समय पहले की बात है वृन्दावन में
श्रीबांके
बिहारी जी के मंदिर में रोज
पुजारी जी बड़े भाव से सेवा
करते थे। वे रोज बिहारी जी की
आरती करते , भोग
लगाते और उन्हें शयन कराते और रोज चार लड्डू
भगवान के बिस्तर के पास रख देते थे। उनका यह भाव
था कि बिहारी जी को यदि रात में भूख
लगेगी तो वे उठ
कर खा लेंगे। और जब वे सुबह मंदिर के पट खोलते थे
तो भगवान के बिस्तर पर प्रसाद बिखरा मिलता था।
इसी भाव से वे रोज ऐसा करते थे।
एक दिन बिहारी जी को शयन कराने के बाद
वे चार
लड्डू रखना भूल गए। उन्होंने पट बंद किए और चले
गए। रात में करीब एक-दो बजे , जिस दुकान से वे
बूंदी
के लड्डू आते थे , उन बाबा की दुकान
खुली थी। वे घर
जाने ही वाले थे तभी एक छोटा सा बालक
आया और
बोला बाबा मुझे बूंदी के लड्डू चाहिए।
बाबा ने कहा - लाला लड्डू तो सारे ख़त्म हो गए। अब
तो मैं दुकान बंद करने जा रहा हूँ। वह बोला आप अंदर
जाकर देखो आपके पास चार लड्डू रखे हैं। उसके हठ
करने पर बाबा ने अंदर जाकर देखा तो उन्हें चार लड्डू
मिल गए क्यों कि वे आज मंदिर नहीं गए थे। बाबा ने
कहा - पैसे दो।
बालक ने कहा - मेरे पास पैसे तो नहीं हैं और तुरंत
अपने हाथ से सोने का कंगन उतारा और बाबा को देने
लगे। तो बाबा ने कहा - लाला पैसे नहीं हैं तो रहने दो
,
कल अपने बाबा से कह देना , मैं उनसे ले लूँगा। पर वह
बालक नहीं माना और कंगन दुकान में फैंक कर भाग
गया। सुबह जब पुजारी जी ने पट खोला तो
उन्होंने देखा
कि बिहारी जी के हाथ में कंगन
नहीं है। यदि चोर भी
चुराता तो केवल कंगन ही क्यों चुराता। थोड़ी
देर बाद
ये बात सारे मंदिर में फ़ैल गई।
जब उस दुकान वाले को पता चला तो उसे रात की बात
याद आई। उसने अपनी दुकान में कंगन ढूंढा और
पुजारी
जी को दिखाया और सारी बात सुनाई। तब
पुजारी जी
को याद आया कि रात में , मैं लड्डू रखना ही भूल गया
था। इसलिए बिहारी जी स्वयं लड्डू लेने
गए थे।
🌿यदि भक्ति में भक्त कोई सेवा भूल भी जाता है तो
भगवान अपनी तरफ से पूरा कर लेते हैं।
शुभ-दिवस
राधे-राधे.
मांगी थी इक कली उतार कर
हार दे दिया
चाही थी एक धुन अपना सितार दे दिया
झोली बहुत ही छोटी
थी मेरी "कृष्णा"
तुमने तो कन्हैया हंस कर सारा संसार दे दिया
"""""""जय जय श्री राधे कृष्णा"""""



🌷🌺🙏जय श्री राधे🙏🌺🌷



 श्याम के नाम को थाम के.....
प्रीत के धाम में नाम कमा गई मीरा,
जीवन के इकतारे के तार पे....
एक ही नाम रमा गई मीरा,
जोगी जपी ओ तपी सबके कर...
प्रीत की रीत थमा गई मीरा,
प्राण समाये जो श्याम उन्ही में..
शरीर समेत समा गई मीरा.....!
10/08/2015, 08:01 - ‪+91 97800 49402‬: कांता नाम की वृन्दावन में बिहारी जी की अनन्य भक्त थी ।
बिहारी जी को अपना लाला कहा करती थी उन्हें लाड दुलार से रखा करती और दिन रात उनकी सेवा में लीन रहती थी,
क्या मजाल कि उनके लाला को जरा भी तकलीफ हो जाए
एक दिन की बात है कांता बाई अपने लाला को विश्राम करवा कर खुद भी तनिक देर विश्राम करने लगी तभी उसे जोर से हिचकिया आने लगी और वो इतनी बेचैन हो गयी कि उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा था
तभी कांता बाई कि पुत्री उसके घर पे आती है जिसका विवाह पास ही के गाँव में किया हुआ था तब कांता बाई की हिचकिया रुक गयी और वो अच्छा महसूस करने लग गयी उसने अपनी पुत्री को सारा वृत्तांत सुनाया कि कैसे वो हिचकियो में बेचैन हो गयी तब पुत्री ने कहा कि माँ मैं तुम्हे सच्चे मन से याद कर रही थी उसी के फलस्वरूप तुम्हे हिचकिया आ रही थी और अब जब मैं आ गयी हू तो तुम्हारी हिचकिया भी बंद हो चुकी है कांता बाई हैरान रह गयी कि ऐसा भी भलाहोता है तब पुत्री ने कहा हाँ माँ ऐसा ही होता है जब भी हम किसी अपने को मन से याद करते है तोहमारे अपने को हिचकिया आने लगती है
तब कांता बाई ने सोचा कि मैं तो अपने ठाकुर कोहर पल याद करती रहती हू
यानी मेरे लाला को भी हिचकिया आती होंगी??
हाय मेरा छोटा सा लाला हिचकियो में कितना बेचैन हो जाता होगा
नहीं ऐसा नहीं होगा अब से मैं अपने लाला को जरा भी परेशान नहीं होने दूंगी
और उसी दिन से कांता बाई ने ठाकुर को याद करना छोड़ दिया अपने लाला को भी अपनी पुत्री को दे दिया सेवा करने के लिए। लेकिन कांता बाई ने एक पल के लिए भी अपने लाला को याद नहीं किया और ऐसा करते करते हफ्ते बीत गए
और फिर एक दिन जब कांता बाई सो रही थी तो साक्षात बांके बिहारी कांता बाई के सपने में आते है और कांता बाई के पैर पकड़ कर ख़ुशी के आंसू रोने लगते है....?
कांता बाई फोरन जाग जाती है और उठकर अपने लाला को प्रणाम करते हुए रोने लगती है और कहती है कि प्रभु आप तो उन को भी नहीं मिल पाते जो समाधि लगाकर निरंतर आपका ध्यान करते रहते है फिर मैं पापिन जिसने आपको याद भी करना छोड़ दिया है आप उसे दर्शन देने कैसे आ गए??
तब बिहारी जी ने मुस्कुरा कर कहा-
माँ कोई भी मुझे याद करता है तो या तो उसके पीछे किसी वस्तु का स्वार्थ होता है या फिर कोई साधू ही जब मुझे याद करता है तो उसके पीछेभी उसका मुक्ति पाने का स्वार्थ छिपा होता हैलेकिन धन्य हो माँ तुम ऐसी पहली भक्त हो जिसने ये सोचकर मुझे याद करना छोड़ दिया कि जब मैं अपने लाला को याद करती होंगी तो उसे हिचकिया आती होंगी और वो बेचैन होता होगा मेरी इतनी परवाह करने वाली माँ मैंने पहली बार देखी है तभी कांता बाई अपने मिटटी के शरीर को छोड़ कर अपने लाला में ही लीन हो जाती है और कांता बाई के लाला की सेवा पहले के जैसेउसकी बेटी के हाथो होने लगती है...
इसलिए बंधुओ वो ठाकुर तुम्हारी भक्ति के भी भूखे नहीं है वो तो केवल तुम्हारे प्रेम के भूखे है उनसे प्रेम करना सीखो और उनसे केवल और केवल किशोरी जी ही प्रेम करना सिखा सकती है इसलिए व्यक्ति को चाहिए कि वो निरंतर किशोरी जी के चरणों का ध्यान करता रहे और उनके नाम का संकीर्तन अपनी जुबान से करता रहेऔर वो दिन दूर नहीं जब किशोरी जी साक्षात बांके बिहारी जी से तुम्हे मिलवा देंगी........
जय श्री राधे राधे जी


ईश्वर का स्थान

एक बार ब्रह्माजी दुविधा में पड़ गए। लोगों की बढ़ती साधना वृत्ति से वह प्रसन्न तो थे पर इससे उन्हें व्यावहारिक मुश्किलें आ रही थीं। कोई भी मनुष्य जब मुसीबत में पड़ता, तो ब्रह्माजी के पास भागा-भागा आता और उन्हें अपनी परेशानियां बताता। उनसे कुछ न कुछ मांगने लगता। ब्रहाजी इससे दुखी हो गए थे। अंतत: उन्होंने इस समस्या के निराकरण के लिए देवताओं की बैठक बुलाई और बोले, ‘देवताओं, मैं मनुष्य की रचना करके कष्ट में पड़ गया हूं। कोई न कोई मनुष्य हर समय शिकायत ही करता रहता है, जिससे न तो मैं कहीं शांति पूर्वक रह सकता हूं, न ही तपस्या कर सकता हूं। आप लोग मुझे कृपया ऐसा स्थान बताएं जहां मनुष्य नाम का प्राणी कदापि न पहुंच सके।’

ब्रह्माजी के विचारों का आदर करते हुए देवताओं ने अपने-अपने विचार प्रकट किए। गणेश जी बोले, ‘आप हिमालय पर्वत की चोटी पर चले जाएं।’ ब्रह्माजी ने कहा, ‘यह स्थान तो मनुष्य की पहुंच में है। उसे वहां पहुंचने में अधिक समय नहीं लगेगा।’ इंद्रदेव ने सलाह दी कि वह किसी महासागर में चले जाएं। वरुण देव बोले ‘आप अंतरिक्ष में चले जाइए।’

ब्रह्माजी ने कहा, ‘एक दिन मनुष्य वहां भी अवश्य पहुंच जाएगा।’ ब्रह्माजीनिराश होने लगे थे। वह मन ही मन सोचने लगे, ‘क्या मेरे लिए कोई भी ऐसा गुप्त स्थान नहीं है, जहां मैं शांतिपूर्वक रह सकूं।’ अंत में सूर्य देव बोले, ‘आप ऐसा करें कि मनुष्य के हृदय में बैठ जाएं। मनुष्य इस स्थान पर आपको ढूंढने में सदा उलझा रहेगा।’ ब्रह्माजी को सूर्य देव की बात पसंद आ गई। उन्होंने ऐसा ही किया। वह मनुष्य के हृदय में जाकर बैठ गए। उस दिन से मनुष्य अपना दुख व्यक्त करने के लिए ब्रह्माजीको ऊपर ,नीचे, दाएं, बाएं, आकाश, पाताल में ढूंढ रहा है पर वह मिल नहीं रहे। मनुष्य अपने भीतर बैठे हुए देवता को नहीं देख पा रहा है।



एक भक्त हर रोज प्रभु के मंगला दर्शन अपने नजदीकी मंदिर में करता है, और फिर अपने नित्य जीवन कार्य में लग जाता है।
कई वर्षो तक यह नियम चलता रहा।
एक दिन वह भक्त मंदिर पहुँचा तो श्री प्रभु के मंदिर के द्वार बंद पाये, वह आकुल-व्याकुल हो गया।
"अरे ऐसा कैसे हो सकता है?"
मंदिर के द्वार समयानुसार ही बंद किये गये थे, उन्हें मंदिर आने मे थोडी देर हूई थी इस वजह से उनको बहुत खेद पहुंचा।
वह नजदीक एक जगह पर बैठ गया, उनकी आँखों से आँसू बहने लगे, और आंतरिक पुकार उठी।
"ओ मुझसे कहाँ लगी इतनी देर अरे ओ साँवरिया,
साँवरिया साँवरिया मेरे मन बसिया..."
बहते आंसू और दिल की बैचेनी ने उन्हें तडपता दिया, पूरे तन में विरह की आग लग गई।
इतने में कहीं से पुकार आयी "ओ तुने कहाँ लगायी इतनी देर, अरे ओ बांवरिया, बांवरिया! बांवरिया मेरे प्रिय प्यारा..."
वह भक्त आसपास देखने लगा, कौन पुकारता है, पर न कोई आस और न कोई पास था।
वह इधर उधर देखने लगा, पर वहा कोई नहीं था, वह बैचेन हो कर बेहोश हो गया।
काफी देर हुई, उनके पैर को जल की धारा छूने लगी, और वह होश में आ गया।
वह सोचने लगा यह जल आया कहां से?
धीरे-धीरे उठ कर वह जल के स्त्रोत को ढूंढने लगा तो देखा कि वह स्त्रोत श्री प्रभु के द्वार से आ रहा था।
इतने में फिर से आवाज आई- " ओ तुने क्युं लगायी इती देर, अरे ओ बांवरिया..."
वह सोच में पड गया "यह क्या, यह कौन पुकारता है, यहाँ न कोई है, तो यह पुकार कैसी?"
वह फूट फूट कर रोने लगा और कहने लगा - "प्रभु ओ प्रभु..." और फिर से बेहोश हो गया।
बेहोशी में उन्होंने श्रीप्रभु के दर्शन पाये और उनका मुखडा आनंद पाने लगा, उनके चेहरे की आभा तेज होने लगी।
इतने में मंदिर में आरती का घंटा बजा, आये हूऐ अन्य दर्शनार्थी ने उन्हें जगाया।
उन्होंने श्रीप्रभु के जो दर्शन पाये, वहीं दर्शन थे जो उन्होंने बेहोशी में पाये थे।
इतने में उनकी नजर श्रीप्रभु के नयनों पर पहुंची, और वह भक्त स्थिर हो गया।
श्रीप्रभु के नयनों में आंसू.....वह अति गहराई में जा पहुँचा...
ओहहह....
जो जल मुझे स्पर्श किया था वह श्रीप्रभु के अश्रु....
नहीं-नहीं मुझसे यह क्या हो गया?
श्रीप्रभु को कष्ट...
वह बहुत रोया और बार-बार क्षमा माँगने लगा।
श्रीप्रभु ने मुस्कराते दर्शन से कहा, तुने कयुं करदी देर?
अरे अब पल की भी न करना देर ओ मेरे बांवरिया.........
।।हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्ण कृष्णा हरे हरे ।।
।।हरे रामा हरे रामा रामा रामा हरे हरे ।।




कृष्ण और राधा

कृष्ण और राधा स्वर्ग में विचरण करते हुए
 अचानक एक दुसरे के सामने आ गए

 विचलित से कृष्ण-
प्रसन्नचित सी राधा...

कृष्ण सकपकाए,
राधा मुस्काई

 इससे पहले कृष्ण कुछ कहते
 राधा बोल💬 उठी-

"कैसे हो द्वारकाधीश ??"

जो राधा उन्हें कान्हा कान्हा कह के बुलाती थी
 उसके मुख से द्वारकाधीश का संबोधन कृष्ण को भीतर तक घायल कर गया

 फिर भी किसी तरह अपने आप को संभाल लिया

 और बोले राधा से ...

 "मै तो तुम्हारे लिए आज भी कान्हा हूँ
 तुम तो द्वारकाधीश मत कहो!

आओ बैठते है ....
कुछ मै अपनी कहता हूँ
 कुछ तुम अपनी कहो

 सच कहूँ राधा
 जब जब भी तुम्हारी याद आती थी
 इन आँखों से आँसुओं की बुँदे निकल आती थी..."

बोली राधा -
"मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ
 ना तुम्हारी याद आई ना कोई आंसू बहा
 क्यूंकि हम तुम्हे कभी भूले ही कहाँ थे जो तुम याद आते

 इन आँखों में सदा तुम रहते थे
 कहीं आँसुओं के साथ निकल ना जाओ
 इसलिए रोते भी नहीं थे

 प्रेम के अलग होने पर तुमने क्या खोया
 इसका इक आइना दिखाऊं आपको ?

कुछ कडवे सच , प्रश्न सुन पाओ तो सुनाऊ?

कभी सोचा इस तरक्की में तुम कितने पिछड़ गए
 यमुना के मीठे पानी से जिंदगी शुरू की और समुन्द्र के खारे पानी तक पहुच गए ?

एक ऊँगली पर चलने वाले सुदर्शन चक्रपर भरोसा कर लिया
 और
 दसों उँगलियों पर चलने वाळी
 बांसुरी को भूल गए ?

कान्हा जब तुम प्रेम से जुड़े थे तो ....
जो ऊँगली गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों को विनाश से बचाती थी
 प्रेम से अलग होने पर वही ऊँगली
 क्या क्या रंग दिखाने लगी ?
सुदर्शन चक्र उठाकर विनाश के काम आने लगी

 कान्हा और द्वारकाधीश में
 क्या फर्क होता है बताऊँ ?

कान्हा होते तो तुम सुदामा के घर जाते
 सुदामा तुम्हारे घर नहीं आता

 युद्ध में और प्रेम में यही तो फर्क होता है
 युद्ध में आप मिटाकर जीतते हैं
 और प्रेम में आप मिटकर जीतते हैं

 कान्हा प्रेम में डूबा हुआ आदमी
 दुखी तो रह सकता है
 पर किसी को दुःख नहीं देता

 आप तो कई कलाओं के स्वामी हो
 स्वप्न दूर द्रष्टा हो
 गीता जैसे ग्रन्थ के दाता हो

 पर आपने क्या निर्णय किया
 अपनी पूरी सेना कौरवों को सौंप दी?
और अपने आपको पांडवों के साथ कर लिया ?

सेना तो आपकी प्रजा थी
 राजा तो पालाक होता है
 उसका रक्षक होता है

 आप जैसा महा ज्ञानी
 उस रथ को चला रहा था जिस पर बैठा अर्जुन
 आपकी प्रजा को ही मार रहा था
 आपनी प्रजा को मरते देख
 आपमें करूणा नहीं जगी ?

क्यूंकि आप प्रेम से शून्य हो चुके थे

 आज भी धरती पर जाकर देखो

 अपनी द्वारकाधीश वाळी छवि को
 ढूंढते रह जाओगे
 हर घर हर मंदिर में
 मेरे साथ ही खड़े नजर आओगे

 आज भी मै मानती हूँ

 लोग गीता के ज्ञान की बात करते हैं
 उनके महत्व की बात करते है

 मगर धरती के लोग
 युद्ध वाले द्वारकाधीश पर नहीं,
प्रेम वाले कान्हा पर भरोसा करते हैं

 गीता में मेरा दूर दूर तक नाम भी नहीं है,
पर आज भी लोग उसके समापन पर " राधे राधे" कहते है"।।

शिव के विभिन्न नाम

 ऊँ🌻शिवः
ऊँ🌻सदाशिवः
ऊँ🌻शंभुः
ऊँ🌻भोलेनाथः
ऊँ🌻शिवापियः
ऊँ🌻भूतपतिः
ऊँ🌻पशुपतिः
ऊँ🌻हरः
ऊँ🌻हरीः
ऊँ🌻पिनाकीः
ऊँ🌻कामारीः
ऊँ🌻भिमः
ऊँ🌻कालकालः
ऊँ🌻भगवानः
ऊँ🌻नीलकंठः
ऊँ🌻शितीकंठः
ऊँ🌻कैलासवासीः
ऊँ🌻गंगाघरः
ऊँ🌻जटाघरः
ऊँ🌻विरुपाकः
ऊँ🌻वीरभद़ः
ऊँ🌻शूलपाणीः
ऊँ🌻विषणुवलभः
ऊँ🌻विशवेशवरः
ऊँ🌻भवः
ऊँ🌻अजः
ऊँ🌻पालॅवतीपतीः
ऊँ🌻अनंतः
ऊँ🌻मूडः
ऊँ🌻सोमः
ऊँ🌻हविः
ऊँ🌻परमातमाः
ऊँ🌻वृषांगः
ऊँ🌻सवॅजः
ऊँ🌻सामप़ियः
ऊँ🌻वृषभारूढः
ऊँ🌻कठोरः
ऊँ🌻यजमयः
ऊँ🌻ललाटाकः
ऊँ🌻ऊग़ः
ऊँ🌻कृपानिघीः
ऊँ🌻तारकः
ऊँ🌻कवचिः
ऊँ🌻खंडपरशुः
ऊँ🌻खटवांगीः
ऊँ🌻जगदगुरूः
ऊँ🌻जगतवयापीः
ऊँ🌻गिरीशः
ऊँ🌻गणनाथः
ऊँ🌻महादेवः
ऊँ🌻प़जापतिः
ऊँ🌻गिरीप़ियः
ऊँ🌻भूजंगभूषणः
ऊँ🌻प़मथाघिपः
ऊँ🌻कुतिवासाः
ऊँ🌻पुरारातिः
ऊँ🌻रूद़ः
ऊँ🌻महासेनजनकः
ऊँ🌻चारुविक़मः
ऊँ🌻पाशविमोचनः
ऊँ🌻गिरीशः
ऊँ🌻परमेशवरः
ऊँ🌻देवः
ऊँ🌻वयोमकेशः
ऊँ🌻अवयवः
ऊँ🌻अनीशवरः
ऊँ🌻शशिशेखरः
ऊँ🌻अंबिकानाथः
ऊँ🌻अंघकारशूरसूदनः
ऊँ🌻अपवगँप़दः
ऊँ🌻मृगपाणीः
ऊँ🌻परशुहसतः
ऊँ🌻गिरीघनवाः
ऊँ🌻अनघः
ऊँ🌻सथानुः
ऊँ🌻शिपीविषटः
ऊँ🌻शंकरः
ऊँ🌻सोमसूयाँगिनलोचनः
ऊँ🌻दिगंमबरः
ऊँ🌻सहस़पादः
ऊँ🌻सहस़ाकः
ऊँ🌻भगनेत़भिदः
ऊँ🌻अॅमूतिँः
ऊँ🌻अवय़ग़ः
ऊँ🌻हिरणयरेताः
ऊँ🌻भकतवतसलः
ऊँ🌻अहिबुँघनयः
ऊँ🌻सवरमयीः
ऊँ🌻कपदिँः
ऊ🌻सूकमतनुः
ऊँ🌻दुघुॅषॅः
ऊँ🌻सातविकः
ऊँ🌻शासवतः
ऊँ🌻आशुतोषः
ऊँ🌻नटराजः
ऊँ🌻अनेकआतमाः
ऊँ🌻नागेशवरः
ऊँ🌻पंचवकत़ः
ऊँ🌻त़ियिमूतिँः

🌹कृष्ण और सुदामा की मित्रता🌹

🌹कृष्ण और सुदामा की मित्रता🌹

🌷मित्रों संसार में मित्रता का सबसे बड़ा उदाहरण है कृष्ण और सुदामा की मित्रता का वृत्तांत | उसी करुण मित्रता के दृश्य को एक रचना के माध्यम से लिखने का प्रयास किया है | कृपया आप अवलोकित करें |
🌷एक बार द्वारिका जाकर बाल सखा से मिल कर देखो
अपने दुःख की करुण कहानी करूणाकर से कह कर देखो ||
👣👏हे नाथ ! दशा देखो घर की, दुःख को भी आंसू आयेंगे
तुम्हरी , मेरी तो बात नहीं बच्चों को क्या समझायेंगे ?
भूखी , नंगी व्याकुलता के दर्शन हैं उनकी आखों में
सब भिक्षा पात्र भयो रीतो , अब कैसे उन्हें मनाएंगे ?
🌷तन पर वस्त्र आवरण केवल, वस्त्र रह गया है कहने को
बहुत हुआ स्वामी अब मानो ,और बचा क्या अब सहने को ||
🌷ब्राह्मण है यह दीन सुदामा , सखा तीन लोक का स्वामी
संभव है वो भूल गया हो , बचपन की सब बात पुरानी
मै तो हर दिन चाहूँ जाना लेकिन डर है मुझे सुशीला
स्वार्थ छुपा है मिलन धेय में , सब जाने है अन्तर्यामी ||
🌷वैसे भी कुछ नहीं पास में अपने कान्हा को देने को
खाली हाथ नहीं जाऊँगा , अपने कृष्णा से मिलने को ||
🌷यदि तुम हाँ बोलो तो स्वामी चावल मांगू दूजे घर से
कह देना देवर कृष्णा को भाभी ने भेजें हैं घर से
मित्र वधू का चरण दंडवत कह देना उनको हे स्वामी
अपनी भाभी को कह देना शुभ आशीष हमेशा बरसे ||
🌷कितने दिन अब और अमावास रात रहेगी यूँ कटने को
कितने दिन एकादश व्रत अब शेष रहें है यूँ रखने को ||
🌷फटी पुरानी धोती तन पर बाहों में पोटल तांदुल की
चला सुदामा रोते -रोते मन में आशा मित्र मिलन की
नंगे पैर चुभे कंटक से पीड़ा से जागे व्याकुलता
दूर नजर आ रही द्वारिका , वैभव की सुन्दरतम झलकी ||
🌷नगर देख कर विस्मय उपजा जैसे देख रहा सपने हो
कभी देखता स्वर्ण महल को कभी देखता खुद अपने को ||
🌷मुख्य महल के द्वारपाल से लगा पूछने कृष्ण धाम को
द्वारपाल सब हंसकर बोले हे पंडित परिचय प्रमाण दो
बोला नाम सुदामा मेरा बाल सखा हूँ बनवारी का
सुनकर द्वारपाल चौंके सब लगे ताकने दीन- दाम को ||
🌷सुनते ही दौड़े हैं मोहन मुख्यद्वार- स्वागत करने को
सभी रानियाँ चौंक पड़ी जब नंगे पैर चले मिलने को ||
🌷मित्र मिलन की व्याकुलता मे भूल गयो मोहन सब सुध -बुध
मुख्य द्वार पर दीन दशा में देखा मित्र खड़ा है बेसुध
गले लगाया दीन-बंधू ने बाल सखा को रोते -रोते
मित्र मिलन की सुन्दर बेला मित्र प्रेम का दर्शन अद्भुत ||
🌷धन्य हुआ मै मित्र सुदामा , आया है मुझसे मिलने को
रथ पर बैठाया माधव ने बोला राज महल चलने को ||
🌷सिंघासन पर आसन देकर देख सुदामा के पग कंटक
व्याकुल होकर अश्रु धार से धोने लगे दया दुःख भंजक
पीताम्बर से पैर पोंछ कर , पञ्च द्रव्य अभिसेख कराया
भाव विभोर भयो सब देखत दृश्य बड़ा अंतर्मन रंजक ||
🌷आज सुदामा सोच रहा सच कहती थी वो मिल कर देखो
अपने दुःख की करुण कहानी करूणाकर से कह कर देखो ||
🌷सुनो सुदामा भाभी जी ने क्या भेजा देवर की खातिर
लगा छुपाने तांदुल पागल , धन वैभव का दृश्य देखकर
छीन लियो मोहन ने तांदुल बड़े चाव से लगे चबाने
पंडित सोच रहा ये तांदुल लाया मै बेकार यहाँ पर ||
🌷दो मुट्ठी में दो लोकों का वैभव दान दिया पगले को
रोक लिया रानी ने बोली खुद भी कुछ चहिये रहने को ||
🌷जाने की बेला पर सोचा, शायद कान्हा खुद दे देगा
शंशय में चल पड़ा सुदामा बिना दिए ही वापिस भेजा
सोच रहा क्यूँ कर आया मै बात समझती नहीं सुशीला
जो मांगे हुए पडोसी से हैं तांदुल वापिस कैसे होगा ||
🌷टूटा छप्पर गायब देखा महल खड़ा देख्यो सोने को
रानी बनी सुशीला बैठी राजकुमार पुत्र अपने दो ||
🌷फूट -फूट कर रोते रोते लगा कोसने अपने मन को
कितना पापी है यह पंडित जान सका ना मनमोहन को ||...

मांस का मूल्य


मगध के सम्राट् श्रेणिक ने एक बार अपनी राज्य-सभा में पूछा कि- "देश की खाद्य समस्या को सुलझाने के लिए सबसे सस्ती वस्तु क्या है? "
मंत्रि-परिषद् तथा अन्य सदस्य सोचमें पड़ गये। चावल, गेहूं, आदि पदार्थ तो बहुत श्रम बाद मिलते हैं और वह भी तब, जबकि प्रकृति का प्रकोप न हो। ऐसी हालत में अन्न तो सस्ता हो नहीं सकता। शिकार का शौक पालने वाले एक अधिकारी ने सोचा कि मांस ही ऐसी चीज है, जिसे बिना कुछ खर्च किये प्राप्त किया जा सकता है।
उसने मुस्कराते हुए कहा-
"राजन्! सबसे सस्ता खाद्य पदार्थ तो मांस है। इसे पाने में पैसा नहीं लगता और पौष्टिक वस्तु खाने को मिल जाती है।"
सबने इसका समर्थन किया, लेकिन मगध का प्रधान मंत्री अभय कुमार चुप रहा।
श्रेणिक ने उससे कहा, "तुम चुप क्यों हो? बोलो, तुम्हारा इस बारेमें क्या मत है?"
प्रधान मंत्री ने कहा, "यह कथन कि मांस सबसे सस्ता है, एकदम गलत है। मैं अपने विचार आपके समक्ष कल रखूंगा।"
रात होने पर प्रधानमंत्री सीधे उस सामन्त के महल पर पहुंचे, जिसने सबसे पहले अपना प्रस्ताव रखा था।
अभय ने द्वार खटखटाया।
सामन्त ने द्वार खोला। इतनी रात गये प्रधान मंत्री को देखकर वह घबरा गया। उनका स्वागत करते हुए उसने आने का कारण पूछा।
प्रधान मंत्री ने कहा -
"संध्या को महाराज श्रेणिक बीमार हो गए हैं। उनकी हालत खराब है। राजवैद्य ने उपाय बताया है कि किसी बड़े आदमी के हृदय का दो तोला मांस मिल जाय तो राजा के प्राण बच सकते हैं। आप महाराज के विश्ववास-पात्र सामन्त हैं। इसलिए मैं आपके पास आपके हृदय का दो तोला मांस लेने आया हूं। इसके लिए आप जो भी मूल्य लेना चाहें, ले सकते हैं। कहें तो लाख स्वर्ण मुद्राएं दे सकता हूं।"
यह सुनते ही सामान्त के चेहरे का रंग फीका पड़ गया। वह सोचने लगा कि जब जीवन ही नहीं रहेगा, तब लाख स्वर्ण मुद्राएं भी किस काम आएगी!
उसने प्रधान मंत्री के पैर पकड़ कर माफी चाही और अपनी तिजौरी से एक लाख स्वर्ण मुद्राएं देकर कहा कि इस धन से वह किसी और सामन्त के हृदय का मांस खरीद लें।
मुद्राएं लेकर प्रधानमंत्री बारी-बारी से सभी सामन्तों के द्वार पर पहुंचे और सबसे राजा के लिए हृदय का दो तोला मांस मांगा, लेकिन कोई भी राजी न हुआ। सबने अपने बचाव के लिए प्रधानमंत्री को एक लाख, दो लाख और किसी ने पांच लाख स्वर्ण मुद्राएं दे दी। इस प्रकार एक करोड़ से ऊपर स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह कर प्रधान मंत्री सवेरा होने से पहले अपने महल पहुंच गए और समय पर राजसभा में प्रधान मंत्री ने राजा के समक्ष एक करोड़ स्वर्ण मुद्राएं रख दीं।
श्रेणिक ने पूछा, "ये मुद्राएं किसलिए हैं?"
प्रधानमंत्री ने सारा हाल कह सुनाया और बोले -
" दो तोला मांस खरीदने के लिए इतनी धनराशी इक्कट्ठी हो गई किन्तु फिर भी दो तोला मांस नहीं मिला। अपनी जान बचाने के लिए सामन्तों ने ये मुद्राएं दी हैं। अब आप सोच सकते हैं कि मांस कितना सस्ता है?"
जीवन का मूल्य अनन्त है। हम यह न भूलें कि जिस तरह हमें अपनी जान प्यारी होती है, उसी तरह सभी जीवों को अपनी जान प्यारी होती है ।
जियो और जीने दो
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प्राणी मात्र की रक्षा हमारा धर्म है..!! .
 शाकाहार अपनाओ…
पढ़ने एवं समझने के लिये
धन्यवाद!! हरे कृष्ण। 🙏